Sunday, January 19, 2014

हरिवंश राय बच्चन ---- काँटा , काँटा ही कैसे रह गया



मेरी बंद मुठियाँ देखकर
जिस-जिस ने मुझसे पूछा,
"इनमें क्या है ?"
मैंने ईमानदारी से बताया ,
"इनमें क्या है ?
इनमें कदम्ब का फूल है। "
और लोगों ने इस पर
सहज विश्वास कर लिया।

वो तो जब
मेरी मुट्ठियों से
रक्त कि बूंदे चूने लगीं
तब लोगों ने मुझे अविश्वास कि नज़रों से घूरा ,
मुझसे कहा ,
"मुट्ठियाँ तो खोलो। "
और जब मैंने मुट्ठियाँ खोलीं
तो उनमें
कंटकीला धतूरे का फल निकला !

मैं शरमाया ,
मेरा झूठ पकड़ा गया ,
मुझे अपने पर आश्चर्य हुआ ,
क्यूंकि मैंने अपनी आखें खोलकर
कदम्ब का फूल अपनी मुट्ठियों में लिया था।

शायद मैं अपनी भावातिशयता में
काँटे को फूल समझा ,
पर काँटा , काँटा ही कैसे रह गया ,
फूल क्यूँ नहीं नहीं बना ,
उसने तो एक कवि का रक्त पिया था। .....  हरिवंश राय बच्चन

Tuesday, January 14, 2014

जाँ निसार अख़्तर ..... जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी

सौ चांद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी 
तुम आये तो इस रात की औक़ात बनेगी 

उन से यही कह आये कि हम अब न मिलेंगे 
आख़िर कोई तक़रीब - ए - मुलाक़ात बनेगी 

ये हम से न होगा कि किसी एक को चाहें 
ऐ  इश्क़ !  हमारी  न  तेरे  साथ  बनेगी 

हैरत कदा - ए - हुस्न कहाँ है अभी दुनिया 
कुछ और निखर ले तो तिलिस्मात बनेगी

ये  क्या  के  बढ़ते चलो  बढ़ते  चलो आगे
जब  बैठ  के  सोचेंगे  तो  कुछ बात बनेगी

                                   - जाँ निसार अख़्तर 

Sunday, January 5, 2014

अमित श्रीवास्तव ....... " केहि विधि प्यार जताऊं ..........."




कबहुँ आप हँसे ,
कबहुँ नैन हँसे ,
कबहुँ नैन के बीच ,
हँसे कजरा  ।

कबहुँ टिकुली सजै ,
कबहुँ बेनी सजै ,
कबहुँ बेनी के बीच ,
सजै गजरा । 

कबहुँ चहक उठै ,
कबहुँ महक उठै ,
लगै खेलत जैसे,
बिजुरी औ बदरा । 

कबहुँ कसम धरें ,
कबहुँ कसम धरावै ,
कबहूँ रूठें तौ ,
कहुं लागै न जियरा । 

उन्है निहार निहार ,
हम निढाल भएन  ,
अब केहि विधि  ,.
प्यार जताऊं सबरा । .....   अमित श्रीवास्तव 

Saturday, January 4, 2014

गुलज़ार ....... एक शख़्स था बादा-ख़ार था

मेरा क्या था तेरे हिसाब में मेरा साँस साँस उधार था
जो गुज़र गया वो तो वक़्त था, जो बचा रहा वो ग़ुबार था


तेरी आरज़ू में उड़े तो थे, चन्द ख़ुश्क पत्ते चनार के
जो हवा के दोश से गिर पड़ा, उनमें एक ये ख़ाकसार था


वो उदास उदास इक शाम थी, एक चेहरा था इक चराग़ था
और कुछ नहीं था ज़मीन पर, एक आसमाँ का ग़ुबार था


बड़े सूफ़ियों से ख़याल थे, और बयाँ भी उसका कमाल था
कहा मैंने कब के वही था वो, एक शख़्स था बादा-ख़ार था
                                                                                
                                                    ...... गुलज़ार 

Friday, December 27, 2013

अमित श्रीवास्तव ...... "तुम पे, क्या लिखूं"

सुना है, 
तुम लिखते भी हो, 
उसने पूछा था | 
हूँ ! 
मैंने कहा था | 
कुछ मेरे पे लिखो, 
प्यार भरी आँखों, 
से गुदगुदाया, 
तनिक मुझे, 
और उंगलियाँ, 
पकड़ ली थी मेरी | 
गोया, 
उनमें से हर्फ़  निकलेंगे अभी, 
और वो उन्हें, 
अपने इर्द गिर्द, 
समेट  लेगी,
और बना  लेगी,
लिबास,
एक नज़्म  का |
मैंने कहा था, 
हाँ,पर उसके लिए,
तुम्हे जानना होगा, मुझे |
पर, 
मै जब भी,
कोशिश करता हूँ,
जानने  की  तुमको,
तुम, 
मेरे  ख्यालों  की  ही, 
हकीकत  सी  लगती हो |
तुम पे कैसे लिखूं, 
तुम तो 'स्टेंसिल'  हो,
मेरी नज्मों  की,
मेरी ग़ज़लों की |
समय तुमसे ही,
छन कर,
आता है, 
और, 
छपता सा  जाता है, 
सफों पे, 
ज़िन्दगी के मेरी |
तुम तो खुद में, 
एक लफ्ज़  हो,
इबारत हो, 
तबस्सुम  हो, 
एक मिज़ाज हो |
जब भी लौटा  हूँ, 
पास से तेरे, 
कभी नज़्म,
तो, 
कभी ग़ज़ल,
ही,  
छपी मिली है, 
दिल पे मेरे |  
तुम पे, 
क्या लिखूं, 
और कैसे लिखूं ?   ...............  अमित श्रीवास्तव 

Wednesday, December 25, 2013

~कैफ़ भोपाली ~ बच्चा बच्चा तेरा दिवाना लगता है

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है

तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है


आग का क्या है पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है

पाँव ना बाँधा पंछी का पर बाँधा
आज का बच्चा कितना सयाना लगता है

सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है
हँसता चेहरा एक बहाना लगता है

सुनने वाले घंटों सुनते रहते हैं
मेरा फसाना सब का फसाना लगता है

‘कैफ’ बता क्या तेरी गज़ल में जादू है
बच्चा बच्चा तेरा दिवाना लगता है
~  कैफ़ भोपाली  ~

Saturday, November 30, 2013

नीरज ...... एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के

एक तेरे बिना ,प्राण ओ प्राण के 
साँस मेरी सिसकती रही उम्र-भर ! 

बाँसुरी से बिछुड़ जो गया स्वर उसे
भर लिया कंठ में शून्य आकाश ने,
डाल विधवा हुई जो कि पतझर में
माँग उसकी भरी मुग्ध मधुमास ने !

हो गया कूल नाराज जिस नाव से
पा गई प्यार वह एक  मँझधार का ,
बुझ गया जो दीया भोर में दीन-सा
बन गया रात सम्राट अँधियार का !

जो सुबह रंक था, शाम राजा हुआ
जो लुटा आज कल फिर बसा भी वही,
एक मैं ही कि जिसके चरण से धरा
रोज तिल-तिल धसकती रही उम्र-भर ! 

एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के 
साँस मेरी सिसकती रही उम्र भर ! 

प्यार इतना किया जिंदगी में कि जड़ -
मौन तक मरघटों का मुखर कर दिया,
रूप सौंदर्य इतना लुटाया कि हर
भिक्षु के हाथ पर चंद्रमा धर दिया !

भक्ति-अनुरक्ति ऐसी मिली, सृष्टि की
शक्ल हर एक मेरी तरह हो गई, 
जिस जगह आँख मूँदी निशा आ गई
जिस जगह आँख खोली सुबह हो गई !

किंतु इस राग-अनुराग की राह पर
वह न जाने रतन कौन सा खो गया ?
खोजती सी जिसे दूर मुझसे स्वयं
आयु मेरी खिसकती रही उम्र भर !

एक तेरे बिना ,प्राण ओ प्राण के 
साँस मेरी सिसकती रही उम्र भर ! 

वेश भाए न जाने तुझे कौन-सा
इसलिए रोज कपड़े बदलता रहा
किस जगह ,कब ,कहाँ हाथ तू थाम ले
इसलिए रोज गिरता संभलता रहा !

कौन सी मोह ले तान तेरा हृदय
गीत गाया इसी से सभी राग का, 
छेड़ दी रागिनी आँसुओ की कभी
शंख फूँका कभी क्राँति का आग का !

किस तरह ,खेल क्या खेलता तू मिले
खेल खेले इसी से सभी विश्व के ,
कब न जाने करे याद तू इसलिए 
याद कोई ‍कसकती रही उम्र भर !

एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के 
साँस मेरी सिसकती रही उम्र भर !

रोज ही रात आई ,गई रोज ही
आँख झपकी ,मगर नींद आई नहीं
रोज ही हर सुबह, रोज ही हर कली
खिल गई तो मगर मुस्कुराई नहीं !

नित्य ही रास  में बृज रचा चाँद ने 
पर न बाजी बाँसुरिया कभी श्याम की
इस तरह उर - अयोध्या बसाई गई
याद भूली न लेकिन किसी राम की !

हर जगह जिंदगी में लगी कुछ कमी
हर हँसी आँसुओं में नहाई मिली
हर समय, हर घड़ी, भूमि से स्वर्ग तक
आग कोई दहकती रही उम्र भर ! 

एक  तेरे बिना प्राण ओ प्राण के 
सांस मेरी सिसकती रही उम्र-भर !

खोजता ही फिरा पर अभी तक मुझे 
मिल सका कुछ न तेरा ठिकाना कहीं,
ज्ञान से बात की तो कहा बुद्धि ने 
'सत्य है वह मगर आजमाना नहीं' !

धर्म के पास पहुँचा पता यह चला
मंदिरों मस्जिदों में अभी बंद है,
जोगियों ने जताया कि जप-योग है
भोगियों से सुना भोग-आनंद है !

किंतु पूछा गया नाम जब प्रेम से 
धूल से वह लिपट फूटकर रो पड़ा,
बस तभी से व्यथा देख संसार की
आँख मेरी छलकती रही उम्र-भर !

एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के 
साँस मेरी सिसकती रही उम्र-भर !! ...........नीरज