Saturday, January 21, 2012

उसे हमने बहुत ढूँढा , न पाया

उसे   हमने  बहुत  ढूँढा  ,  न   पाया 
अगर पाया तो खोज  अपना न पाया 

मुक़द्दर  ही  पे गर  सूदो - जियां(१) है 
तो  हमने  कुछ  यहाँ  खोया  न  पाया 

सुराग़े - उम्रे -रफ़्ता(२) हो तो क्योंकर 
कहीं जिसका निशाने - पा(३) न पाया 

कहे  क्या  हाए  जख्मे - दिल  हमारा 
दहन(४) पाया ,लबे-गोया(५) न पाया 

कभी तू , और  कभी  तेरा  रहा  गम 
गरज़  खाली  दिले - शैदा(६) न पाया 

नज़ीर उसका कहां आलम में ऐ 'जौक'
कोई   ऐसा   न   पाएगा  , न  पाया 
                                              -जौक
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 १.=लाभ-हानि 
२=बीती आयु का निशान
३=पदचिन्ह 
४=मुँह
५=बोलने वाले होंठ 
६=आसक्त मन 

7 comments:

  1. बहुत सुंदर नज्म ,बेहतरीन पोस्ट....बहुत खूब निवेदिता जी ,
    new post...वाह रे मंहगाई...
    बहुत दिनों से मेरे पोस्ट पर नही आई,..आइये स्वागत है

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति निवेदिता जी.

    मेरे ब्लॉग को क्यूँ भूले हुए हैं आप.
    आपका दर्शन और सुवचन मेरे लिए बहुत प्रेरक होते हैं जी.

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  3. बहुत ही सार्थक एवं सुंदर प्रस्‍तुति

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