Saturday, January 23, 2016

परवीन शाकिर -- तुमको इससे क्या...

टूटी है मेरी नींद मगर, तुमको इससे क्या
बजते रहें हवाओं से दर, तुमको इससे क्या
तुम मौज-मौज मिस्ल-ए-सबा घूमते फिरो
कट जाएँ मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या
औरों के हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊँ अपना ही घर, तुमको इससे क्या
अब्रे-गुरेज़-पा को बरसने से क्या ग़रज़
सीप में बन न पाए गुहर, तुमको इससे क्या
तुमने तो थक के दश्त में ख़ेमे लगा लिए
तन्हा कटे किसी का सफ़र, तुमको इससे क्या...।
-परवीन शाकिर

Sunday, June 28, 2015

शिखा वार्ष्णेय ......... अलगनी पर टंगी उदासियाँ ...




मैंने अलगनी पर टांग दीं हैं 
अपनी कुछ उदासियाँ 
वो उदासियाँ 
जो गाहे बगाहे लिपट जाती हैं मुझसे 
बिना किसी बात के ही 
और फिर जकड लेती हैं इस कदर 
कि छुड़ाए नहीं छूटतीं 
ये यादों की, ख़्वाबों की 
मिटटी की खुश्बू की उदासियाँ 
वो बथुआ के परांठों पर 
गुड़ रख सूंघने की उदासियाँ 
और खेत की गीली मिटटी पर बने 
स्टापू की लकीरों की उदासियाँ 
खोलते ही मन की अलमारी का पल्ला 
भरभरा कर गिर पड़तीं हैं मुझपर 
और सिर तक ढांप लेती हैं मुझे 
भारी पलकों से उन्हें फिर 
समेटा भी तो नहीं जाता 
तो कई कई दिन तक उन्हीं के तले  
दबी, ढकी, पसरी रहती हूँ.
इसलिए अब उन्हें करीने से 
मन के कोने की एक अलगनी में टांग दिया है 
कि एक झलक हमेशा मिलती रहे चुपचाप 
अब वो भी सुकून से हैं और मैं भी।  
                                        -  शिखा वार्ष्णेय 

Friday, June 26, 2015

चला बिहारी ब्लॉगर बनने .............. द ट्रेन...

अकेले सफर करने में आदमी थोड़ा निस्चिंत रहता है. सामान कम, बच्चा को सम्भालने का झंझट नहीं अऊर सबसे बड़ा आराम कि सीट कोनो मिल जाए परेसानी नहीं. नहीं त सिरीमती जी को नीचे वाला सीट चाहिए, बेटी को बीच वाला अऊर हमरे लिए जऊन बच गया सो. मगर अकेले... ई सबसे मुक्त होकर बिना कोनो सफरिंग के सफर.


हमको मिल गया पहिला वाला साइड लोअर सीट. हर दस पाँच मिनिट पर टॉयलेट आने जाने वाला लोग बीच का दरवाजा का खोलकर चला जाता था, अऊर ऊ अपने आप बंद होता था धड़ाम से. हम समझ गए कि रात भर एही चलने वाला है. रेलवे का तकिया से कान बंद कर के सोना पड़ेगा. एक नजर पड़ोस में डाले, त देखे कि बगल में एगो आदमी पचीस छब्बीस साल का, उसके साथ उसकी गर्भवती पत्नी अऊर एक पैंतीस चालीस की औरत. उसकी पत्नी का पेट देखकर समझ में आया गया कि बस प्रसव का दिन करीब है. गोस्सा भी आया कि ऐसा टाइम में काहे सफर कर रहा है, लेकिन रहा होगा कोनो मजबूरी, कौन जाने.


       ( चित्र साभारः mikophotography)
आधा रात के बाद नींद गहराया होगा कि हमको कराहने का आवाज सुनाई दिया. घबरा कर हम उठ कर बईठ गए. सामने पर्दा लगा हुआ था अऊर उसी के पीछे से कराहने का आवाज आ रहा था. अब हमरे मन में भी परिस्थिति को देखकर डर समाने लगा. हम उठकर पूछे उस आदमी से लेकिन ऊ बोला कि घबराने का कोनो बात नहीं है.

उसके बाद हम सो नहीं सके, काहे कि उसका कराहना बढता जा रहा था अऊर पूरा डिब्बा में खाली हम जाग रहे थे. सब लोग अपना एयर कंडीशंड बर्थ पर तकिया से कान दबाकर सोया रहा. अब हमरा घबराहट गोस्सा में बदल गया. हम ऊ आदमी से बोले, “ अईसा हालत में आप काहे लेकर जा रहे हैं दिल्ली. घर में लोग नहीं है कि घर से निकाल दिया है?”

“नहीं, ई बात नहीं है. हम फौज में हैं, दिल्ली में फौजी अस्पताल में सब मुफ्त में हो जाएगा.”

“पागल कहीं का, मुफ्ते में डिलिभरी करवाना था त पटना में दानापुर मिलिट्री हॉस्पीटल नहीं था!!”

उसके बाद त हमरा गोस्सा बढा जा रहा था. उ आदमी भी परेसान बुझाया. सबसे जादा परेसानी ई था कि ऊ औरत का दर्द अऊर बेचैनी बढ़ रहा था. सुबह के टाइम में लोग का नींद भी बहुत गाढा हो गया. गाड़ी सीधा दिल्ली रुकने वाला अऊर हमलोग अभी टुंडला से निकले थे. लग रहा था कि ई औरत दिल्ली तक जाने का हालत में नहीं है. उसका चेहरा एकदम पीला होता जा रहा था.

अब हम उठे अऊर पहिला बार अपना पिताजी का दिया हुआ रेलवे ज्ञान इस्तेमाल किए. कण्डक्टर से रिजर्वेसन का चार्ट लेकर सबसे पहिले देखे कि कोनो डॉक्टर सफर कर रहा है कि नहीं. देखे कि दू डिब्बा आगे एगो डॉक्टर था. हम भागे, मन ही मन एही मनाते हुए कि कहीं ऊ पीएच. डी. वाला न हो. खैर ऊ डॉक्टर को हम बिनती किए अऊर समझाए. सीरियस समझ कर ऊ भी नहीं आना चाहा. मगर हमरा बात सुनकर अऊर अनजान आदमी को परेसान देखकर ऊ आया, नब्ज देखा अऊर बोला कि देरी करने से परेसानी हो सकता है. अऊर केस अईसा है कि बिना इंतजाम के कुछ भी नहीं किया जा सकता है.

हम उसको धन्यवाद दिए अऊर क्ण्डक्टर को बोले की वॉकी टॉकी पर गाड़ी के इंचार्ज गार्ड से बात करवाओ. ऊ बोला नहीं हो पाएगा. मगर हमरे अन्दर पता नहीं कहाँ से अजीब सक्ति समा गया था. हम बोले, “ नहीं होगा त तुम सब जेल जाओगे. हमको सिखाते हो. हमरे पिताजी एही सेक्सन पर काम करते थे अऊर हमको सब पता है.”

ऊ घबराया कि हमरा बात से संतुष्ट हुआ, मगर हमको वॉकी टॉकी लाकर पकड़ा दिया. हम गार्ड से बोले, “सर यहाँ जिंदगी मौत का सवाल है. आपको अलीगढ़ में गाड़ी रुकवानी होगी. और वहाँ मेडिकल युनिट को प्लेट्फॉर्म पर रहने को कहना होगा.”

“मैं ख़बर करता हूँ. मगर आपको सिर्फ दो मिनट का समय मिलेगा.”

“धन्यवाद सर! दो मिनट बहुत होते हैं.”

ऊ फौजी हमरा मुँह देख रहा था, औरत चीख रही थी, मगर अब चीख का आवाज़ कुछ कम हो गया .हम उस आदमी को कहे कि सामान दरवाजा पर लेकर जाओ. गाड़ी रुकते के साथ सामान लेकर अपनी दीदी (जो औरत साथ में थी) को उतरने को बोलो, अगिला दरवाजा से. ई दरवाजा से हम दुनो मिलकर इनको बिछावन समेत उठाकर नीचे ले जाएंगे. तब तक स्ट्रेचर भी आ जाएगा.

अलीगढ़ इस्टेसन के पहिले ही जब गाड़ी में झटका लगा त हम समझ गए कि गाड़ी मेन लाइन से लूप लाइन में आ गया है यानि प्लेटफारम पर. भागकर देखे त आधा दर्जन नर्स का टीम स्ट्रेचर लेकर खड़ा था. ऊ आदमी औरत का सिरहाना पकड़ा अऊर हम दुनो गोड़ के तरफ से धीरे से सहारा देकर उठाए.

संजोग देखिए, दरवाजा तक पहुँचते पहुँचते हमको नबजात बच्चा का रोने का आवाज सुनाई दिया. तब तक हम स्ट्रेचर पर उस औरत को उतार चुके थे. उसका चीख तेज होकर बंद हो गया था. हम अबाक पायदान पर खड़े थे. गाड़ी चलने लगा. अचानक ऊ औरत स्ट्रेचर पर से करवट बदली अऊर हमरे तरफ घूमकर देखी. उसका आँख से मोटा मोटा लोर टपक रहा था.
                                                 - चला बिहारी ब्लॉगर बनने 

Tuesday, June 23, 2015

अनुलता ....... रूपांतरण

स्त्री के भीतर
उग आती हैं और एक स्त्री
या अनेक स्त्रियाँ.....
जब वो अकेली होती है
और दर्द असह्य हो जाता है |
फिर सब मिल कर बाँट लेती हैं दुःख !
औरत अपने भीतर उगा लेती है एक बच्चा
और खेलती हैं बच्चों के साथ
खिलखिलाती है,तुतलाती है
घुलमिल कर !
रूपांतरण की ये कला ईश्वर प्रदत्त है |
कभी कभी
एक पुरुष भी उग आया करता है
स्त्री के भीतर
जब बाहर के पुरुषों द्वारा
तिरस्कृत की जाती है |
तब वो सशक्त होती है उनकी तरह !
सदियों से
इस तरह कायम है
स्त्रियों का अस्तित्व !
कि उनके भीतर की उपजाऊ मिट्टी में
उम्मीद के बीज हैं बहुत
और नमी है काफी !
~अनुलता ~

Wednesday, June 11, 2014

कैफ़ी आज़मी ..... बुतशिकन कोई कहीं से भी ना आने पाये

बुतशिकन कोई कहीं से भी ना आने पाये
हमने कुछ बुत अभी सीने में सजा रक्खे हैं
अपनी यादों में बसा रक्खे हैं

दिल पे यह सोच के पथराव करो दीवानो
कि जहाँ हमने सनम अपने छिपा रक्खे हैं
वहीं गज़नी के खुदा रक्खे हैं
बुत जो टूटे तो किसी तरह बना लेंगे उन्हें
टुकड़े टुकड़े सही दामन में उठा लेंगे उन्हें
फिर से उजड़े हुये सीने में सजा लेंगे उन्हें
गर खुदा टूटेगा हम तो न बना पायेंगे
उस के बिखरे हुये टुकड़े न उठा पायेंगे
तुम उठा लो तो उठा लो शायद
तुम बना लो तो बना लो शायद
तुम बनाओ तो खुदा जाने बनाओ क्या
अपने जैसा ही बनाया तो कयामत होगी
प्यार होगा न ज़माने में मुहब्बत होगी
दुश्मनी होगी अदावत होगी
हम से उस की न इबादत होगी
वह्शते-बुत शिकनी देख के हैरान हूँ मैं
बुत-परस्ती मिरा शेवा है कि इंसान हूँ मैं
इक न इक बुत तो हर इक दिल में छिपा होता है
उस के सौ नामों में इक नाम खुदा होता 
                                            .........कैफ़ी आज़मी

Monday, June 2, 2014

~~ समीर लाल ’समीर’ ~~ तुमको सलाम लिखता हूँ

याद करो वो रात..
वो आखिरी मुलाकात..
जब थामते हुए मेरा हाथ
हाथों में अपने
कहा था तुमने...
लिख देती हूँ
मैं अपना नाम
हथेली पर तुम्हारी
सांसों से अपनी ...
फिर ...
कर दी थी तुमने..
अपनी हथेली सामने मेरे ..
कि लिख दूँ मैं भी
अपना नाम उस पर
सांसों से अपनी.....
कहा था तुमने...
सांसों से लिखी इबारत..
कभी मिटती नहीं..
कभी धुलती नहीं..
चाहें आसूँओं का सैलाब भी
उतर आये उन पर..
वो दर्ज रहती हैं
खुशबू बनी हरदम.. हर लम्हा...
साथ में हमारे.....
आज बरसों बाद जब...
बांचने को कल अपना...
खोल दी है मैने.... मुट्ठी अपनी.....
तब...हथेली से उठी...
उसी खुशबू के आगोश में...
ए जिन्दगी!!..
एक बार फिर .....अपने बहुत करीब....
अहसासा है तुम्हें!!....
“मैं ज़िन्दगी की किताब में, यूँ अपना पसंदीदा कलाम लिखता हूँ..
लिख देता हूँ तुम्हारा नाम, और फिर तुमको सलाम लिखता हूँ......”

Wednesday, May 7, 2014

रमाजय शर्मा ....... विषबेल

मुझे विषबेल
क्यों समझ लिया
माँ
मैं तो एक
कोंपल थी
तेरे ही तन की
क्यूं उखाड़ फेंका
फिर मुझे तूने
माँ
क्या तुझे मैं
लगी विषबेल सी
मैं तो तेरे ही
अंतर में उपजी
तेरे ही जैसी
तेरा ही रूप थी
माँ
जब जब मैंने
तेरी कोख में
आने की कोशिश की
तूने क्यूं मुझे
उखाड़ फेंका
माँ
एक बार
बाहरआने का 
मौका दे कर 
तो देखती
माँ
मुझ से ज्यादा
तेरा दर्द
कोई न समझता
माँ
क्योंकि जब जब
मुझे उखाड़ा गया
तेरी कोख से
जितना दर्द मुझे हुआ
माँ
उस से कहीं 
ज्यादा दर्द
तुझे हुआ था
माँ
मेरे आंसू तो
बह ही नही पाये
लेकिन तूने
छिप छिप कर
जाने कितने तकिये
भिगोये थे
माँ
एक बार बस
हिम्मत कर के
देखती तो 
माँ
ये विषबेल
तेरी अमरबेल
बन जाती
माँ  ................. रमाजय शर्मा