Sunday, June 28, 2015

शिखा वार्ष्णेय ......... अलगनी पर टंगी उदासियाँ ...




मैंने अलगनी पर टांग दीं हैं 
अपनी कुछ उदासियाँ 
वो उदासियाँ 
जो गाहे बगाहे लिपट जाती हैं मुझसे 
बिना किसी बात के ही 
और फिर जकड लेती हैं इस कदर 
कि छुड़ाए नहीं छूटतीं 
ये यादों की, ख़्वाबों की 
मिटटी की खुश्बू की उदासियाँ 
वो बथुआ के परांठों पर 
गुड़ रख सूंघने की उदासियाँ 
और खेत की गीली मिटटी पर बने 
स्टापू की लकीरों की उदासियाँ 
खोलते ही मन की अलमारी का पल्ला 
भरभरा कर गिर पड़तीं हैं मुझपर 
और सिर तक ढांप लेती हैं मुझे 
भारी पलकों से उन्हें फिर 
समेटा भी तो नहीं जाता 
तो कई कई दिन तक उन्हीं के तले  
दबी, ढकी, पसरी रहती हूँ.
इसलिए अब उन्हें करीने से 
मन के कोने की एक अलगनी में टांग दिया है 
कि एक झलक हमेशा मिलती रहे चुपचाप 
अब वो भी सुकून से हैं और मैं भी।  
                                        -  शिखा वार्ष्णेय 

12 comments:

  1. शिखा जी बेहद दिल को छू लेने वाली प्रस्तुति से भेंट करवाने के लिए आभार.
    आपके बाकी ब्लॉग भी देखे अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आना क भी फुरसत में फिर आती हूँ

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मटर और पनीर - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. This comment has been removed by the author.

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  4. मेरी उदासियाँ कुछ सुकून पा गईं यहाँ आकर :)

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  5. सुन्दर औएर संवेदनशील रचना है शिखा जी की ... आभार साझा करने के लिए ...

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  6. उदासियों को अलगनी पर टांगना बेहद भाया।
    भावुक करती रचना।

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  7. सुन्दर शब्द रचना

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  8. उदासियों को अपने से दूर कर कर ही हम आगे बढ़ सकते है। सुंदर प्रस्तुति।

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  9. उदासियों को अपने से दूर कर कर ही हम आगे बढ़ सकते है। सुंदर प्रस्तुति।

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