Saturday, January 23, 2016

परवीन शाकिर -- तुमको इससे क्या...

टूटी है मेरी नींद मगर, तुमको इससे क्या
बजते रहें हवाओं से दर, तुमको इससे क्या
तुम मौज-मौज मिस्ल-ए-सबा घूमते फिरो
कट जाएँ मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या
औरों के हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊँ अपना ही घर, तुमको इससे क्या
अब्रे-गुरेज़-पा को बरसने से क्या ग़रज़
सीप में बन न पाए गुहर, तुमको इससे क्या
तुमने तो थक के दश्त में ख़ेमे लगा लिए
तन्हा कटे किसी का सफ़र, तुमको इससे क्या...।
-परवीन शाकिर

3 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति।

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  2. बहुत सुन्दर रचना
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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  3. आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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