Saturday, January 23, 2016

परवीन शाकिर -- तुमको इससे क्या...

टूटी है मेरी नींद मगर, तुमको इससे क्या
बजते रहें हवाओं से दर, तुमको इससे क्या
तुम मौज-मौज मिस्ल-ए-सबा घूमते फिरो
कट जाएँ मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या
औरों के हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊँ अपना ही घर, तुमको इससे क्या
अब्रे-गुरेज़-पा को बरसने से क्या ग़रज़
सीप में बन न पाए गुहर, तुमको इससे क्या
तुमने तो थक के दश्त में ख़ेमे लगा लिए
तन्हा कटे किसी का सफ़र, तुमको इससे क्या...।
-परवीन शाकिर

5 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति।

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  2. बहुत सुन्दर रचना
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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  3. आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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  4. नमस्ते,
    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 17 मई 2018 को प्रकाशनार्थ 1035 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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  5. लाजवाब रचना...
    वाह!!!

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