Saturday, October 13, 2012

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के ......

दोनों  जहान तेरी  मोहब्बत  में  हार  के 
वो जा  रहा  है  कोई  शबे-गम गुज़ार के 

वीरां है मैकदा  ख़ुमो-सागर(1)  उदास है 
तुम क्या गये कि रूठ गये दिन बहार के 

इक फुर्सते-गुनाह मिली ,वो भी चार दिन 
देखे  हैं  हमने  हौसले  परवर  दिगार  के 

दुनियां ने तेरी  याद से बेगाना कर दिया 
तुझसे  भी दिलफरेब  हैं गम रोज़गार के 

भूले से  मुस्करा तो दिए थे वो आज फैज़ 
मत पूछ बल-बले दिले नाकर्दाकार(2) के 

                                                    -फैज़ 

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1 -शराब का प्याला और सुराही 
2-अनुभवहीन दिल 

9 comments:

  1. फैज़ की ग़ज़ल को क्या कहें , बस शुभानाल्लाह .

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  2. वाह...
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (14-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  3. बहुत बढ़िया |
    बधाई ||

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  4. दुनियां ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
    तुझसे भी दिलफरेब हैं गम रोज़गार के !

    बहुत खूब..
    लिखने वाले भी क्या लिख जाते हैं...!

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  5. वीरां है मैकदा (मयकदा ) ख़ुमो-सागर(1) उदास है।।।।।।।।।मयकदा ........
    तुम क्या गये कि रूठ गये दिन बहार के

    फैज़ अहमद फैज़ साहब को पढ़वाया शुक्रिया .

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  6. बहुत खूब लिखा आपने |

    इस समूहिक ब्लॉग में आए और हमसे जुड़ें :- काव्य का संसार

    यहाँ भी आयें:- ओ कलम !!

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  7. फैज़ साहब की यह ग़ज़ल बहुत मशहूर है. जहां को कृपया जहान कर लें.

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