Monday, November 18, 2013

---- कबीर

प्रेम न खेती उपजै, प्रेम न हाट बिकाय !
राजा प्रजा जेहि रुचे, सीस देहि ले जाय !!

जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान !
जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण !!

जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश !
जो है जा की भावना सो ताहि के पास !!

प्रेम पियाला जो पिए, सिस दक्षिणा देय !
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय !!

प्रेम भाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाये !
चाहे घर में बास कर, चाहे बन को जाए !!
                                        ---- कबीर

2 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. बहुत खूब !खूबसूरत रचना,। सुन्दर एहसास .
    शुभकामनाएं.

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