Tuesday, March 29, 2011

कुन्ज में बैठा रहूं .......

कुंज   में    बैठा   रहूं   यूं   पर   ख़ुला 
काश ,कि  होता क़फ़स  का दर ख़ुला 
हम  पुकारें  और  खुले ,यूं कौन जाय
यार  का  दरवाजा   पायें   गर   ख़ुला
हमको  है  इस  राज़दारी  पर घमण्ड 
दोस्त का  है राज़ ,दुश्मन  पर  ख़ुला 
वाकई दिल पर,भला लगता था दाग़
ज़ख्म ,लेकिन दाग़ से  बेहतर  ख़ुला 
हाथ से रख दी  कब  अबरू  ने  कमां
कब  कमर से गमज़े की ख़ंजर ख़ुला 
मुफ़्त  का  किसको  बुरा  है  बदरक़ा
रहरवी  में   परद - ए - रहबर    ख़ुला 
सोज़े-दिल का,क्या करे बाराने-अश्क 
आग भड़की,मुंह अगर दम भर ख़ुला 
नामे के साथ आ  गया  पैगामे - मर्ग
रह  गया  ख़त  मेरी  छाती पर ,ख़ुला 
देखियो ,ग़ालिब से गर  उलझा  कोई
है  वली  पोशीदा ,और  काफ़िर  ख़ुला 
              साभार :ग़ालिब 
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गमज़े=हाव-भाव 
बदरक़ा=मार्ग-दर्शक
परद-ए-रहबर =अगुवा का भेद 
बाराने -अश्क=अश्रु-वृष्टि 
पैगामे-मर्ग =मृत्यु-सन्देश 

Monday, March 28, 2011

मोहब्बत की मोहब्बत तक ही जो दुनिया समझते हैं..

मोहब्बत की मोहब्बत तक  ही जो दुनिया समझते हैं 
खुदा  जाने  वो   क्या समझे  हुए  हैं  क्या  समझते हैं 

जमाले - रंगों - बू  तक  हुस्न  की  दुनिया  समझते हैं 
जो सिर्फ इतना समझते हैं वो आखिर क्या समझते हैं 

कमाले - तश्नगी  ही  से  बुझा  लेते  हैं   प्यास   अपनी
इसी  तपते  हुए  सहरा   को   हम  दरिया  समझते  हैं

हम,उनका इश्क कैसा , उनके गम के भी नहीं काबिल 
ये   उनकी   मेहरबानी   है  कि  वो  ऐसा   समझते   हैं 

मोहब्बत  में  नहीं   सैरे - मनाजिर   की  हमें   परवाह 
हम  अपने हर  नफ़स को इक नयी दुनिया समझते हैं 

ख़बर   इसकी  नहीं  उन  खामकाराने - मोहब्बत  को 
उसी  को  दुःख  भी  देते  हैं  जिसे  अपना  समझते हैं 

                         साभार :जिगर मुरादाबादी 
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सैरे-मनाजिर =दृश्य देखने की 
नफ़स = श्वास 
खामकाराने-मोहब्बत =प्रेम में अपरिपक्व व्यक्ति 
  

Wednesday, March 23, 2011

दो बांस , तीन डंडों से बनी .......

दो  बांस , तीन  डंडों   से  बनी  नसेनी यह 
जो खडी सेहन का जोड़ रही छत से  नाता ,
धरती-आकाश  बने  जब से तब से इसपर
हर  एक यहाँ चढ़-उतर , उतर-चढ़  जाता !

आंधियां   घिरीं   तूफ़ान   चले , टूटे   पहाड़  
बदला जग ,बदली सदियाँ ,बदले सिंहासन,
पर अब तक बदल नहीं पाया है क्षण भर को 
इस  नयी पुरानी पीढी  का संसृति - शासन !

कोई   आँगन  में , कोई  पहली   सीढी  पर 
कोइ  हो   खडा  दूसरी    पर   पछताता   है 
पग धरने को  है  कोई  विकल  तीसरी  पर 
कोई छत पर जा कर निज सेज बिछाता है 

अचरज  होता  है  कैसे  बस  दो बांसों पर 
है  सधी सृष्टि इतनी विशाल ,इतनी भारी !
कैसे केवल  घुन  लगे  तीन  इन  डंडों  पर 
चढ़-उतर रही है युग-युग से दुनिया सारी !

है  यह  भी  एक  प्रश्न  मैं  पूछ  रहा  खुद से 
क्या  सबका  छत  पर जाना यहाँ ज़रूरी है ?
आना है क्या अनिवार्य सभी का आँगन में ?
क्या  एक  नसेनी  सिर्फ़  ज़िन्दगी  पूरी  है ?


उत्तर  देता  आकाश  कि  चढ़ना  ही जीवन 
औ ' मृत्यु   उतरने  का   ही एक  बहाना  है 
है जन्म-मरण बस तीन सीढियों  की  दूरी 
सबको  ऊपर   जाना  है  ,  नीचे  आना   है !


             साभार :नीरज   

Thursday, March 17, 2011

आंखों का था कुसूर न दिल का कुसूर था .......

आंखों  का  था  क़ुसूर  न  दिल  का  क़ुसूर था 
आया   जो    मेरे    सामने    मेरा   ग़ुरूर   था 

वो   थे  न   मुझसे   दूर  न  मैं  उनसे  दूर  था
आता  न  था  नज़र  तो  नज़र  का  क़ुसूर  था

कोई    तो     दर्दमंदे  -   दिले  -  नासुबूर    था 
माना कि तुम न  थे , कोई  तुम - सा ज़रूर था 

लगते    ही    ठेस   टूट   गया   साज़े  -  आरज़ू
मिलते ही  आंख शीशा - ए - दिल चूर - चूर था 

ऐसा    कहां    बहार   में   रंगीनियों  का   जोश 
शामिल  किसी  का  खूने - तमन्ना  ज़रूर  था 

साक़ी की चश्मे -मस्त का क्या कीजिये बयान 
इतना   सरूर   था   कि   मुझे   भी   सरूर   था 

जिस दिल को तुमने लुत्फ़ से अपना बना लिया 
उस दिल  में  इक  छुपा  हुआ  नश्तर  ज़रूर  था 

देखा  था  कल ' जिगर ' को   सरे - राहे - मैक़दा
इस  दर्ज़ा  पी  गया   था   कि  नशे  में  चूर   था 

                       साभार :जिगर मुरादाबादी 
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दर्दमंदे-दिले-नासुबूर =अधीर ह्रदय का हितैषी 
सरे-राहे-मैक़दा =मधुशाला के रास्ते में 


Tuesday, March 15, 2011

कब हुज़ूमे - ग़म से मेरी जान घबराती नहीं .....

कब   हुजूमे - ग़म   से   मेरी   जान  घबराती  नहीं 
मै तो  मर  जाऊं , करूँ  पर  क्या   मौत आती  नहीं 
कौन  है  जिसको  नहीं  डर  आहे - सोजाँ  का   मेरे
कांपता   शोला   नहीं   था   या   बर्क़  थर्राती    नहीं 
क्या हुआ बाद-अस्ल गर ज़ाहिर में है नेको-सिफ़ात
जौहरे - जाती   पर    उनका   गैर - बदजाती    नहीं 
साफ़ खूब - ओ - जिश्त कह  देता है मुँह पर आइना 
बल    बेदीदे    का    सफ़ाई   आँख   शरमाती   नहीं 
हम  सरी   करता  है   गुल आरिज़ से उसकी ऐ सबा 
दो  तमांचे  मार  कर   तू   उसको   समझाती   नहीं
पहुँचे    हैं   चाके - गरेबाँ   ता    बदामन    हर   घड़ी 
मैं  कहूँ  क्यों   कर   कि  वहशत  पाँव  फैलाती नहीं 
याँ    तो   हम   बातें   बनाते   हैं   हज़ारों   ऐ  ज़फर 
जा  के  वाँ   कोई   भी  हमसे  बात  बन  आती नहीं 


                 साभार : ज़फर 
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आहे-सोजाँ =जलती आह 
बद-अस्ल=दुष्ट 
नेको-सिफ़ात =अच्छी आदत वाला 
जौहरे-जाती =निज गुण 
खूब-ओ-जिश्त=अच्छा-बुरा 
बल =लेकिन 
बेदीदे =आँख 
हमसरी=बराबरी 
आरिज़ =गाल 
बदामन =नीचे तक    



Monday, March 14, 2011

शायरे - फ़ितरत हूं मैं ........

शायरे - फ़ितरत हूं  मैं ,जब फ़िक्र फ़रमाता हूं  मैं 
रूह   बन   कर  ज़र्रे - ज़र्रे   में    समा  जाता    हूं

आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूं मैं 
जैसे हर  शै  में  किसी  शै  की  कमी  पाता  हूं  मैं 

जिस क़दर अफसाना-ए-हस्ती को दोहराता हूं मैं 
और  भी  बेगाना - ए - हस्ती   हुआ  जाता हूं   मैं 

जब   मकानों - लामकां  सब  से  गुज़र   जाता   हूं  मैं 
अल्लाह-अल्लाह तुझको खुद अपनी जगह पाता हूं मैं 

हाय  री  मजबूरियां  ,  तर्के -  मोहब्बत  के   लिए 
मुझको समझाते हैं वो और उनको समझाता हूं मैं 

मेरी  हिम्मत   देखना  ,  मेरी    तबीयत  देखना 
जो सुलझ जाती है गुत्थी फिर से उलझाता हूं मैं 

हुस्न को क्या दुश्मनी  है , इश्क़ को  क्या बैर  है 
अपने  ही  क़दमों  की  खुद ही ठोकर खाता हूं मैं 

तेरी महफ़िल तेरे जल्वे फिर तक़ाज़ा क्या ज़रूर 
ले उठा  जाता  हूं  जालिम , ले  चला जाता  हूं मैं 

                 साभार :जिगर मुरादाबादी 
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शायरे-फ़ितरत =प्रकृति का शायर 
मकानो-लामका =स्थान 
  

Sunday, March 13, 2011

" तरबियत "

ज़िन्दगी कुछ  और  शै  है ,इल्म  है  कुछ  और  शै |
ज़िंदगी   सोज़े - जिगर , इल्म   है  सोज़े - दिमाग़ ||
इल्म में दौलत भी  है ,क़ुदरत  भी है ,लज्ज़त भी है |
एक  मुश्किल है कि हाथ  आता  नहीं अपना सुराग ||
अहले - दानिश  आम  हैं , कमयाब हैं अहले - नज़र |
क्या तअज्जुब  है  कि  ख़ाली  रह  गया तेरा अयाग ||
शैख़  !  मकतब  के  तरीक़ों  से  कुशादे - दिल  कहां |
किस तरह किबरीत से रोशन हो बिजली का चिराग ||

              साभार :इकबाल 
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सोज़े-जिगर =ह्रदय स्पर्शी 
अहले -दानिश =बुद्धिमान 
कमयाब =बहुत कम 
अहले -नज़र =दृष्टिवान 
अयाग =प्याला 
कुशादे -दिल =ह्रदय की विशालता 
किबरीत =गंधक