Wednesday, February 23, 2011

"नादां - कोशिश"

घंटों बैठी सोचती हूं की कौन सी धड़कन नज़्म करूं 
कौन सा रंग मुट्ठी में भर लूं 
किस   लम्हे   को  कैद   करूं

सोच की इस  नादां  कोशिश  पे  बैठी - बैठी  सोचती हूं
किसने  लम्हे क़ैद  किये  या ख़ुशबू  को  पाबन्द किया   
लफ़्ज़ों के बोसीदा  जाल  से  कौन  रंग को थाम  सका 

आज तो रूह उस दौर में है जिस दौर का कोई नाम नहीं 
एक घना  धंधलका हर  सू 
कोई सुबह ,कोई शाम नहीं 

मौसम की सांय - सांय में सन्नाटा - सन्नाटा है 
बारिश ने पायल  तो   पहनी 
पर    कोई     झंकार     नहीं 
धड़कन के लब तो हिलते हैं
पर    कोई    आवाज़    नहीं 

हर शेर है  भीगा - भीगा सा और  नज़्म  है रूठी - रूठी सी 
इस बोझलपन को ओढ़-लपेट ,चुपचाप मैं घंटों सोचती हूं 
अब कौन सी धड़कन नज़्म करूं
और  किस  लम्हे  को  क़ैद  करूं 

        साभार : मीना कुमारी 

Monday, February 21, 2011

यूं ही तेरी राह्गुज़र से .......

यूं   तेरी  राहगुज़र  से ,  दीवानावार   गुज़रे
कांधे पे अपने रख के अपना  मज़ार  गुज़रे 

बैठे हैं रास्ते में बयाबान-ए-दिल सजा  कर 
शायद इसी तरफ़ से इक दिन बहार  गुज़रे 

दार-ओ-रसन से दिल तक,सब रास्ते अधूरे
जो  एक  बार  गुज़रे , वो  बार - बार   गुज़रे

बहती हुई यह  नदिया , धुलते  हुए किनारे
कोई  तो  पार  उतरे ,  कोई  तो  पार  गुज़रे 

मस्जिद के ज़ेर-ए-साया ,बैठे जो थक-थका कर 
बोला  हर  इक  मिनारा ,"तुझ  से  हज़ार  गुज़रे "

कुर्बान इस नज़र पे , मरियम की सादगी भी 
साये से जिस नज़र के ,सौ करदिगार  गुज़रे 

अच्छे लगे  हैं दिल को तेरे गिले  भी लेकिन 
तू दिल ही हार  गुज़रा , हम जान हार  गुज़रे 

मेरी   तरह   संभाले   कोई   जो   दर्द   जानूं 
इक बार दिल से हो  कर परवरदिगार  गुज़रे 

          साभार : मीना कुमारी 
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दार-ओ-रसन से =फ़ांसी के तख्ते से 
ज़ेर-ए-साया =छाया में 

    

Saturday, February 19, 2011

" हर इक सूरत हर इक तस्वीर ........"

हर इक सूरत हर इक तस्वीर मुबहम होती जाती है
इलाही , क्या  मिरी  दीवानगी  कम  होती जाती  है 

ज़माना  गर्मे -  रफ्तारे  -  तरक्क़ी   होता  जाता  है 
मगर इक चश्मे -शायर है की पुरनम होती जाती है 

यही    जी   चाहता   है   छेड़ते    ही   छेड़ते   रहिये 
बहुत दिलकश अदाए -हुस्ने -बरहम होती जाती है 

तसव्वुर  रफ़्ता - रफ़्ता इक सरापा बनाता जाता है
वो इक शै जो मुझी में है ,मुजस्सिम होती जाती है 

वो रह-रहकर गले मिल-मिलके रुख़सत होते जाते है
मिरी आँखों से  या  रब ! रौशनी  कम  होती जाती  है 

"जिगर " तेरे सुकूते - ग़म ने ये क्या कह दिया उनसे 
झुकी  पड़ती  है  नज़रे ,आंख   पुरनम  होती  जाती  है

     साभार : जिगर मुराबादी 

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मुबहम =अस्पष्ट 
चश्मे - शायर =शायर की आंख
अदाए-हुस्ने-बरहम =नाराज़गी में सौन्दर्य की अदा 
तसव्वुर =ध्यान 
सरापा =साकार 
मुजस्सिम = साकार 
सुकूते -ग़म =ग़म के कारण चुप्पी        

" जो बजाय - खुद आह होती है ......."

जो   बजाय  -  खुद    आह   होती  है 
हाय   वो   क्या    निगाह    होती   है  

इक नज़र दिल की सम्त देख तो लो 
कैसे    दुनिया    तबाह     होती     है

यूँ   न   पर्दा   करो  खुदा   के    लिए 
देखो    दुनिया    तबाह    होती     है 

वो भी  है  यक़  मुक़ामे - इश्क़  जहां 
हर    तमन्ना     गुनाह    होती    है  

हासिले - हुस्नो - इश्क़  उसे समझो 
वो   जो   पहली   निगाह   होती   है 

एक   ऐसा   भी    वक़्त   होता    है 
मुस्कराहट    भी   आह    होती   है 


         साभार : जिगर मुरादाबादी 

Thursday, February 17, 2011

मिलाये खाक में गर वह ........

मिलाये ख़ाक में गर वह सितम शआर मुझे 
बला से समझे  मगर अपना खाकसार  मुझे
वह  गरचे  दुश्मने - सब्रो - क़रार   है लेकिन 
न देखूं जब  तलक  उसको नहीं क़रार  मुझे 
शुमार  हो न  सके जिनका  ताबरोज़ शुमार
दिए  फ़लक  ने   है  व  दाग़  बेशुमार   मुझे
वुफूरे - गिरिय  ने   मेरे  बचा  लिया  वरना 
जला चुकी थी मेरी  आहे - शोला -बार मुझे 
खुली  हुई   है   मेरी  जेरे - खाक  भी  आंखे 
किसी का आह यहाँ तक  है इन्तिज़ार मुझे 
मज़ा तो  यह है  कि  होते   हैं  मुझसे  ख़फा 
तो और आता है उन पर  ज़्यादा  प्यार मुझे 
ज़फ़र जहाँ में करूं  किसको राज़दार अपना 
कि इश्क़  से नहीं  अपना  भी एतिबार मुझे  

    साभार : ज़फ़र 
     
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सितम शआर =अत्याचारी 
ताबरोज़ शुमार = प्रलय के दिन तक 
वुफूरे - गिरिय =आंसुओं की अधिकता 
जेरे ख़ाक =कब्र में 


दिन कटा , जाइये अब ..........(ज़ौक )

दिन कटा , जाइए अब रात किधर  काटने को 
जब से वो घर में नहीं , दौड़े  है घर  काटने को 

हाए  सैयाद  तो  आया  मिरे   पर  काटने  को 
मैं तो ख़ुश था कि छुरी लाया है सर काटने को 

अपने आशिक़ को न खिलवाओ कनी हीरे की 
उसके आसूं ही किफ़ायत हैं जिगर काटने को 

वो शजर हु न गुलो  -  बार  न  साया   मुझमें 
बागबां ने  लगा  रक्खा  है  मगर  काटने  को 

शाम से  ही दिले - बेताब का  है ज़ौक ये हाल
है  अभी   रात   पड़ी   चार  पहर   काटने  को

     साभार : ज़ौक
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सैयाद = शिकारी 
किफ़ायत = काफ़ी
शजर = पेड़ 
गुलो - बार =फूल- फल 
  

Tuesday, February 15, 2011

" इकबाल "

तेरे   इश्क़  की   इंतेहा  चाहता   हू 
मेरी सादगी  देख  क्या  चाहता  हू |
सितम  हो कि वादा - ए - बेहिज़ाबी
कोई बात सब्र - आज़मा चाहता हू |
ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को 
कि मैं आपका सामना चाहता हू  |
कोई दम का मेहमां हू ए अहले-महफ़िल 
चिराग़ - सहर  हू  बुझना  चाहता  हू |
भरी बज़्म में राज़  की बात कह दी 
बड़ा बेअदब  हू सज़ा चाहता हू |


       साभार : इक़बाल