Saturday, January 21, 2012

उसे हमने बहुत ढूँढा , न पाया

उसे   हमने  बहुत  ढूँढा  ,  न   पाया 
अगर पाया तो खोज  अपना न पाया 

मुक़द्दर  ही  पे गर  सूदो - जियां(१) है 
तो  हमने  कुछ  यहाँ  खोया  न  पाया 

सुराग़े - उम्रे -रफ़्ता(२) हो तो क्योंकर 
कहीं जिसका निशाने - पा(३) न पाया 

कहे  क्या  हाए  जख्मे - दिल  हमारा 
दहन(४) पाया ,लबे-गोया(५) न पाया 

कभी तू , और  कभी  तेरा  रहा  गम 
गरज़  खाली  दिले - शैदा(६) न पाया 

नज़ीर उसका कहां आलम में ऐ 'जौक'
कोई   ऐसा   न   पाएगा  , न  पाया 
                                              -जौक
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 १.=लाभ-हानि 
२=बीती आयु का निशान
३=पदचिन्ह 
४=मुँह
५=बोलने वाले होंठ 
६=आसक्त मन 

Saturday, October 22, 2011

ये राहे - कू - ए - यार है राहे अदम नहीं ........

वो दिन है कौन सा कि सितम पर सितम नहीं 
गर ये  सितम  है  रोज़ तो  इक  रोज़ हम नहीं 

ये   दिल  मुझे   डुबो  के  रहेगा , कि  सीने  में 
वो  कौन  सा   है  दाग़  जो  गिर्दाबे - ग़म नहीं 

अहले - सफ़ा का देखा न  दामन किसी ने तर 
गौहर है  अपनी  आब  में  ग़र्क और नम नहीं 

गर आबे - दीद  शर्बते - कौसर भी है तो क्या 
जब तक कि उसमें चाशनी- ए- दर्दो -ग़म नहीं 

जाता  है  आँखें  बंद  किए   ज़ौक  तू   कहां
ये  राहे - कू - ए - यार  है  राहे  अदम  नहीं 
                                                        -ज़ौक 

Friday, October 21, 2011

दो घड़ी के बाद ......


क्या आए तुम जो आए घड़ी दो घड़ी के बाद
सीने में सांस होगी अड़ी दो घड़ी के बाद 

कोइ  घड़ी  अगर वो मुलाइम हुए तो क्या 
कह बैठेंगे फिर एक कड़ी दो घड़ी के बाद 

क्या रोका अपने गिरिये को हमने कि लग गई
फिर वो ही आंसुओं की झड़ी दो घड़ी के बाद 

कल हमने उससे तर्के - मुलाक़ात की तो क्या 
फिर उस  बगैर कल न पड़ी दो घड़ी के बाद 

गर दो घड़ी तक उसने न देखा इधर तो क्या 
आख़िर हमीं से आँख लड़ी दो घड़ी के बाद 

क्या जाने दो घड़ी वो रहे "ज़ौक" किस तरह 
फिर तो न ठहरे पाँव घड़ी दो घड़ी के बाद 
                                                 -ज़ौक

Saturday, October 8, 2011

हे वीणा वादिनी वर दे !


                 हे वीणा वादिनी वर दे !
मेरी एक कोरी कॉपी को तू कविताओं से भर दे ! 

अगर कहीं पर सम्मेलन में मेरे सुर छिड़ जायें ,
जनता की क्या बात ,लीडर भी भागे-भागे आयें ,
संयोजक झट झोली में ,नोटों की गड्डी भर दे !
                हे वीणा वादिनी वर दे !

मेरे गीतों को सुन कर , 'नीरज' भी  पानी भर जाये ,
'पुष्प'-वुष्प की गिनती क्या ,बेढ़ब सा ज्ञानी डर जाये ,
जो गुण है 'काका हाथरसी में' ,वह सब मुझमें जड़ दे !
                 हे वीणा वादिनी वर दे !

वीर रस की कविता सुनाकर ,पब्लिक में 'हुल्लड़' मचवाये ,
ऐसे  जूते  चलें  वहाँ   पर ,  संयोजक  भी  पिट  जाये ,
ऐटम  बम  जैसे  परमाणु  , मेरी  वीणा  में  धर   दे ! 
                 हे वीणा वादिनी वर दे !
                                             -हुल्लण मुरादाबादी 

Friday, October 7, 2011

दुनिया में बड़ी चीज़ मेरी जान ! हैं आँखें

हर तरह के जज्बात का ऐलान है आँख 
शबनम कभी ,शोला कभी तूफ़ान है आँखें 

आँखों  से  बड़ी  कोई  तराजू  नहीं  होती 
तुलता है बशर जिसमें वो मीज़ान हैं आँखें 

आँखें ही मिलाती  हैं  जमाने में दिलों को 
अनजान हैं हम तुम अगर अनजान हैं आँखें 

लब कुछ भी कहें इससे हक़ीक़त नहीं खुलती 
इंसान   के  सच  झूठ  की  पहचान  हैं   आँखें 

आँखें  न  झुकें  तेरी  किसी  गैर  के  आगे 
दुनिया  में  बड़ी  चीज़  मेरी जान  !  हैं  आँखें 

                         -साहिर लुधियानवी

Thursday, August 18, 2011

दिये से मिटेगा न मन का अन्धेरा ............

दिये से मिटेगा न मन का अन्धेरा 
धरा को उठाओ गगन को झुकाओ !!

बहुत बार आई-गई यह दिवाली 
मगर तम जहाँ था वहीं पर खड़ा है ,
बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक 
कफ़न रात का हर चमन पर पड़ा है ,
न फिर सूर्य रूठे ,न फिर स्वप्न टूटे 
ऊषा को जगाओ ,निशा को सुलाओ !
दिये से मिटेगा न मन का अन्धेरा 
धरा को उठाओ गगन को झुकाओ !!

सृजन-शान्ति के वास्ते है जरूरी 
कि हर द्वार पर रौशनी गीत गाये 
तभी मुक्ति का यज्ञ  यह पूर्ण होगा ,
कि जब प्यार तलवार से जीत जाए ,
घृणा बढ़ रही है ,अमा चढ़ रही है
मनुज को जिलाओ ,दनुज को मिटाओ ! 
दिये से मिटेगा न मन का अन्धेरा 
धरा को उठाओ गगन को झुकाओ !!

बड़े वेगमय पंख हैं रोशनी के 
न वह बंद रहती किसी के भवन में ,
किया कैद जिसने उसे शक्ति-छल से 
स्वयं उड़ गया वह धुआँ बन पवन में ,
न मेरा-तुम्हारा ,सभी का प्रहर यह 
इसे भी बुलाओ उसे भी बुलाओ !
दिये से न मिटेगा न मन का अन्धेरा 
धरा को उठाओ ,गगन को झुकाओ !!
                                              - नीरज

Sunday, August 14, 2011

मर के भी कब तक निगाहे - शौक़ को रुसवा करें ...........

मर के  भी  कब  तक  निगाहें -शौक़  को  रुसवा करें 
ज़िन्दगी तुझ को  कहाँ  फैंक आयें ,आखिर क्या करें

ज़ख्मे-दिल  मुमकिन  नहीं तो चश्मे-दिल ही वा करें१ 
वो    हमें    देखें   न    देखें   हम   उन्हें    देखा   करें 

ऐ  मैं  कुर्बां  मिल  गया  अर्जे-मोहब्बत   का  सिला 
हाँ  उसी  अंदाज़  से  कह  दो ,तो फिर हम क्या करें

देखिये   क्या   शोर   उठता   है   हरीमे - नाज़   से२ 
सामने  आईना  रख  कर  ख़ुद  को इक सिज्दा करें

हाए  ये   मजबूरियां   , महरूमियां   ,  नाकामियां
इश्क़ आखिर इश्क़ है ,तुम क्या करो ,हम क्या करें

                                            - जिगर मुरादाबादी 
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१:मन के नेत्र ही खोलें
२:प्रेयसी के घर की चारदीवारी से