Friday, May 10, 2013

कैफ़ी आज़मी : बुतशिकन कोई कहीं से भी ना आने पाये

बुतशिकन कोई कहीं से भी ना आने पाये
हमने कुछ बुत अभी सीने में सजा रक्खे हैं
अपनी यादों में बसा रक्खे हैं

दिल पे यह सोच के पथराव करो दीवानो
कि जहाँ हमने सनम अपने छिपा रक्खे हैं
वहीं गज़नी के खुदा रक्खे हैं

बुत जो टूटे तो किसी तरह बना लेंगे उन्हें
टुकड़े टुकड़े सही दामन में उठा लेंगे उन्हें
फिर से उजड़े हुये सीने में सजा लेंगे उन्हें

गर खुदा टूटेगा हम तो न बना पायेंगे
उस के बिखरे हुये टुकड़े न उठा पायेंगे
तुम उठा लो तो उठा लो शायद
तुम बना लो तो बना लो शायद

तुम बनाओ तो खुदा जाने बनाओ क्या
अपने जैसा ही बनाया तो कयामत होगी
प्यार होगा न ज़माने में मुहब्बत होगी
दुश्मनी होगी अदावत होगी
हम से उस की न इबादत होगी

वह्शते-बुत शिकनी देख के हैरान हूँ मैं
बुत-परस्ती मिरा शेवा है कि इंसान हूँ मैं
इक न इक बुत तो हर इक दिल में छिपा होता है
उस के सौ नामों में इक नाम खुदा होता है

                                                   - कैफ़ी आज़मी 

Friday, April 19, 2013

बच्चन .........क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी ?

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी ?
         क्या करूँ ?
मैं दुखी जब - जब हुआ 
संवेदना तुमने दिखाई ,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा 
रीति दोनों ने निभाई , 
किंतु इस आभार का अब 
हो उठा है बोझ भारी ;

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी ?
         क्या करूँ ?

एक भी उच्छ्वास मेरा 
हो सका किस दिन तुम्हारा ?
उस नयन से बह सकी कब 
इस नयन की अश्रुधारा ?
सत्य को मूँदे रहेगी 
शब्द की कब तक पिटारी ?

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी ?
         क्या करूँ ?

                              ........बच्चन 

Saturday, March 9, 2013

गमगुसारी


दोस्त मायूस न हो 
सिलसिले टूटते बनते ही रहे हैं आखिर 
तेरी पलकों पे सरअश्कों के सितारे कैसे
तुझको गम है तेरी महबूब तुझे मिल न सकी 
और जो जीस्त तराशी थी तेरे ख्वाबों ने
आज वो ठोस हक़ायक़ में कहीं टूट गयी
तुझको मालूम है मैंने भी मुहब्बत की थी
और अंजामे-मुहब्बत भी है मालूम तुझे 
किसने पायी है भला जीस्त की तल्खी से निजात 
चारो-नाचार ये जहराब सभी पीते हैं  
जां-सपारी के फरेबिन्दा फसानों पे न जा 
कौन मरता है  मुहब्बत में सभी जीते हैं 
वक़्त हर जख्म को हर गम को भुला देता है 
वक़्त के साथ ये सदमा भी गुज़र जायेगा 
और ये बातें जो दुहराई हैं मैंने इस वक़्त 
तू भी एक रोज इन्हीं बातों को दुहरायेगा 
दोस्त मायूस न हो.
                      -अहमद राही  
C

Friday, March 8, 2013

किराये का है ये मकां ........ - कुंअर बेचैन

किराये का है ये मकां छोड़ते हैं । 
ऐ मालिक ,तेरा ये जहां छोड़ते हैं । 

ये क्यूँ कह दिया इश्क़ को छोड़ दें हम , 
लो हम जिस्म से अपनी जां छोड़ते हैं । 

तो ये जानिये बाग़ में कुछ कमी है ,
परिंदे अगर आशियां छोड़ते हैं । 

भले ही वो केंचुल बदल कर भी आएं  ,
मगर लोग डंसना कहां छोड़ते हैं । 

किसी के मुबारक कदम लफ्ज़ बनकर ,
मेरी हर गज़ल में निशां छोड़ते हैं । 

कहां ऐसे बेटों को खुशियां मिलेंगी ,
जो रोती हुई अपनी मां छोड़ते हैं । 

न तू हीर है और न रांझा हूं मैं ही ,
चलो ,फिर भी एक दास्तां छोड़ते हैं । 

बड़े लोग भी बादलों की तरह ही ,
जमीं के लिए आस्मां छोड़ते हैं । 

उजाले जो दें उनकी कालिख न देखो ,
कि जलते दिये भी धुंआ छोड़ते हैं । 
                               - कुंअर बेचैन  

Wednesday, February 27, 2013

किसी की आँखों की नमी लिख रहा हूं......


कहीं पढ़ा था और मुझे बहुत अच्छी लगी थी ,पर वहाँ इसके शायर का नाम नहीं लिखा था इसलिए नाम नहीं दे पा रही हूँ । अगर किसी को पता हो तो कृप्या बता दें जिससे मैं नाम भी लिख सकूँ और श्रेय उचित व्यक्ति को मिल सके .......

किसी की आँखों की नमी लिख रहा हूं
बेजान उन अश्कों की गमी लिख रहा हूं

खिलते नहीं हैं फूल अब इस गुलशन में
अपने नाम कुछ बंजर ज़मीं लिख रहा हूं

मिलने को मिल जाये कायनात सारी
तू जो नहीं है,तेरी कमी लिख रहा हूं.....


बेजान उन अश्कों की गमी लिख रहा हूं
अपने नाम कुछ बंजर ज़मीं लिख रहा हूं 

                                        -अज्ञात 

Sunday, October 28, 2012

ख़ुदा से हुस्न ने इक रोज़ यह सवाल किया |..... - इक़बाल

ख़ुदा से हुस्न ने इक रोज़ यह सवाल किया |
जहां में क्यों  न मुझे  तूने लाज़वाल किया ?
मिला जवाब  कि तस्वीरखाना  है  दुनिया |
शबे - दराज़  अदम  का फ़साना है दुनिया ||
हुई  है  रंगे - तग़य्युर से जब नमूद इसकी |
वही हसीं  है  हक़ीक़त  ज़वाल है  जिसकी ||
कहीं  करीब  था  ये  गुफ़्तगू क़मर ने सुनी |
फ़लक पे आम हुई अख्तरे - सहर ने सुनी ||
सहर ने तारे से सुन कर सुनाई शबनम को |
फ़लक की बात बता दी ज़मीं के महरम को ||
फिर आये फूल के आंसू पयामे - शबनम से |
कली का नन्हा-दिल दिल खून हो गया ग़म से ||
चमन  से  रोता  हुआ  मौसमे - बहार  गया |
शबाब  सैर  को  आया  था , सोगवार  गया ||
                                                       - इक़बाल 
........................................................................
लाज़वाल :अमर
शबे - दराज़ : लम्बी रात 
अदम : मृत्यु 
रंगे - तग़य्युर :परिवर्तनशीलता के रंग से 
ज़वाल :मिटना 
क़मर :चाँद 
अख्तरे - सहर : सुबह का तारा 
महरम :भेदी 

Saturday, October 27, 2012

बताता जा रे अभिमानी ! ....- महादेवी वर्मा

बताता जा रे अभिमानी !

कण-कण उर्वर करते लोचन 
स्पंदन  भर  देता  सूनापन 
जग का धन मेरा दुःख निर्धन ;
तेरे वैभव की भिक्षुक या 
कहलाऊँ रानी !
बताता जा रे अभिमानी !

दीपक सा जलता अन्तस्तल 
संचित कर आँसू के बादल 
लिपटा है इससे प्रलयानिल ;
क्या यह दीप जलेगा तुझसे 
भर हिम का पानी ?
बताता जा रे अभिमानी !

चाहा था तुझमें मिटना भर 
दे डाला बनना मिट - मिटकर 
यह अभिशाप दिया है या वर ;
पहली मिलन कथा हूँ या मैं 
चिर - विरह कहानी ! 
बताता जा रे अभिमानी !
           - महादेवी वर्मा