Tuesday, February 15, 2011

" इकबाल "

तेरे   इश्क़  की   इंतेहा  चाहता   हू 
मेरी सादगी  देख  क्या  चाहता  हू |
सितम  हो कि वादा - ए - बेहिज़ाबी
कोई बात सब्र - आज़मा चाहता हू |
ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को 
कि मैं आपका सामना चाहता हू  |
कोई दम का मेहमां हू ए अहले-महफ़िल 
चिराग़ - सहर  हू  बुझना  चाहता  हू |
भरी बज़्म में राज़  की बात कह दी 
बड़ा बेअदब  हू सज़ा चाहता हू |


       साभार : इक़बाल

" ज़ौक " की गज़ल

जीना  नज़र अपना  हमें  उसला  नहीं आता
गर आज  भी  वो रश्के - मसीहा  नहीं आता 


मजकूर तिरी बज्म में किस का  नहीं आता
पर  ज़िक्र  हमारा  नहीं  आता ,  नहीं  आता 


आता है दम आंखो में दमे - हसरते - दीदार 
पर लब पे  कभी हर्फे - तमन्ना  नहीं  आता 


बेजा है दिल  ! उसके न  आने की शिकायत 
क्या कीजिएगा फर्माइये , अच्छा नहीं आता 


हम रोने पे आ  जाएं तो  दरिया  ही  बहा  दें 
शबनम की तरह से  हमें  रोना  नहीं  आता 


किस्मत ही से लाचार  हुं  ऐ  जौक  वर्गना
सब फ़नमें हुं मैं ताक मुझे क्या नहीं आता 


       साभार : ज़ौक 
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उसला = कदापि 
रश्के - मसीहा  =प्रेयसी 
मज़कूर = ज़िक्र 
ताक़ = दक्ष 

Sunday, February 13, 2011

ज़फ़र की शायरी

कीजे ना दस में बैठ के आपस की  बातचीत 
पहुचेगी दस हजार जगह दस  की  बातचीत 
कब तक रहें ख़ामोश कि ख़ातिर  से आपकी 
हमने बहुत सुनी कसो - नाकस की बातचीत 
मुद्दत के बाद हज़रते - नासेह ! करम  किया 
फ़रमाइए  मिज़ाजे -  मुक़द्दस  की  बातचीत
पर तर्के- इश्क़  के  लिए  इर्शाद  कुछ  न  हो
मैं क्या करूं नहीं यह मेरे  बस  की  बातचीत 
क्या याद आ गया है ज़फ़र पंजा - ए - निगार 
कुछ हो रही  है बंदो - मुखम्मस की बातचीत 


       साभार : ज़फ़र 
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कसो - नाकस =किस -किस की 
मिज़ाजे - मुक़द्दस = पवित्र मिज़ाज 
इरशाद = आज्ञा 
पंजा - ए - निगार  =महबूब के मेहंदी लगे हाथ 
बंदो - मुखम्मस  = पांच - पांच मिसरों के बंद वाली कविता 

Sunday, February 6, 2011

...........दर्दे -- मुश्तर्क .........

सुनते   हैं   सैलाब  में  डूबा  हुआ  था  इक   दरख्त
जिसकी चोटी पर डरे हुए बैठे थे दो आशुफ़्ता-बख्त


एक  उनमें   सांप  था  और   एक  सहमा  नौजवां 
दो ज़दो  का  एक  भीगी  शाख़  पर  था  आशियां 


सच  है  दर्दे - मुश्तर्क  में   है  वो  रूहे - इत्तिहाद 
इश्क़  में  जिसके बदल जाते  हैं  आईने - इनाद 


लेकिन ऐ गाफ़िल मुसलमानों ! मुदब्बिर हिन्दुओं 
हिंद के सैलाब में  इक  शाख़  पर  तुम  भी  तो  हो 


      साभार : जोश मलीहाबादी 


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दर्दे - मुश्तर्क = साझी पीड़ा 
आशुफ़्ता - बख्त = अभागे 
ज़दो का =आहतो   का
रूहे - इत्तिहाद = संगठन शक्ति 
आईने इनाद = शत्रुता के नियम 
मुदब्बिर = कूटनीतिज्ञ  

Friday, February 4, 2011

साहिर लुधियानवी ........... दीवाना कर दिया दिले - बेईख्तियार ने

देखा तो था यूं ही किसी ग़फ़लत -शआर ने 
दीवाना  कर  दिया  दिले -  बेईख्तियार  ने 


ये   आरज़ू  के   धुंधले  खराबो  !  जवाब  दो 
फिर किस की याद आई थी मुझको पुकारने 


तुझको खबर नहीं मगर इक सादालौह को 
बर्बाद  कर  दिया तेरे दो दिन  के प्यार  ने 


मै और तुम से तर्के- मोहब्बत का आरजू 
दीवाना कर  दिया  है  गमे -  रोज़गार  ने 


अब ऐ दिले - तबाह ! तेरा क्या ख़्याल है 
हम तो चले थे काकुले - गेती  संवारने  ||


           साभार : साहिर  लुधियानवी 
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ग़फ़लत - शआर =लापरवाही जिसका स्वभाव हो 
खराबो =खंडहरो 
सादालौह = सरल स्वभाव वाले 
काकुले -गेती = संसार रूपी केश 

Wednesday, February 2, 2011

......."दीने -आदमीयत "........

ये  मुसलमां  है , वो हिन्दू , ये  मसीही , वो यहूद 
इस पे  ये  पाबंदिया  हैं , और  उस  पर  ये  क़यूद


शैख़-ओ-पंडित ने भी क्या अहमक बनाया है हमें 
छोटे -  छोटे   तंग    खानों  में  बिठाया  है    हमें 


क़सूर-ए -इंसानी पे ज़ुल्मो -ज़हल बरसाती  हुई 
झंडिया  कितनी  नज़र  आती  हैं  लहराती  हुई 


कोई  इस  ज़ुल्मत  में  सूरत  ही  नहीं  नूर  की 
मुहर हर दिल पे लगी है इक-न-इक दस्तूर की 


घटते - घटते  मेहरे -आलमताब से तारा हुआ 
आदमी  है  मज़हबो -तहज़ीब  का  मारा  हुआ 


कुछ तमददुन के खलफ कुछ दीन के फ़रज़न्द हैं 
कुलजमो  के   रहने   वाले   बुलबुलों  में   बंद   हैं 


फिर   रहा  है  आदमी   भूला   हुआ  भटका   हुआ 
इक -न - इक लेबिल हर इक माथे पे है लटका हुआ 


अपने हमजिंसो के कीने से भला क्या फ़ायदा 
 टुकडे -टुकडे हो के जीने से भला क्या फ़ायदा 


                    साभार :जोश मलीहाबादी 
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क़यूद =बंधन 
ज़ुल्मत में =अंधकार  में 
मेहरे आलमताब से  = संसार को प्रकाशमान करने वाले सूर्य से 
तमददुन =संस्कृति 
खलफ =पुत्र 
कुलजमो  के = समुद्रों के 
हमजिंसो =साथी मनुष्यों 
कीने =द्वेष 

Tuesday, February 1, 2011

" हकीकते --हुस्न "

खुदा से हुस्न ने  इक रोज़ यह सवाल किया |
जहां में क्यों न मुझे  तूने    लाज़वाल किया ?


मिला जवाब कि तस्वीरखाना    है  दुनिया |
शबे- दराज अदम का  फ़साना  है  दुनिया  ||


हुई  है  रंगे - तग्य्युर से  जब  नमूद इसकी |
वही हसीं  है   हकीक़त जवाल  है  जिसकी ||


कहीं करीब  था ये  गुफ्तगू कमर  ने  सुनी |
फलक  पे आम हुई  अख्तरे -सहर ने सुनी ||


सहर ने तारे से सुन कर सुनाई शबनम को |
फलक की बात बता दी जमीं के महरम को ||


फिर आये  फूल के आंसू  पयामे  शबनम  से |
कली का नन्हा सा दिल खून हो गया गम से ||


चमन से  रोता  हुआ  मौसमे - बहार  गया |
शबाब  सैर  को  आया  था  सोगवार  गया  ||  


                                       साभार : इकबाल
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लाजवाल =अमर 
शबे- दराज =लम्बी रात 
अदम =मृत्यु 
रंगे -तग्य्युर =परिवर्तनशीलता  के रंग से 
जवाल  = मिटना
कमर =चांद 
अख्तरे-सहर =सुबह का तारा 
महरम = भेदी 
सोगवार = उदास